Uttarakhand Goverment
  • कोविड से जूझ रहे डॉ. निशंक अब पूरी तरह स्वस्थ
  • काफी दिनों से एम्स में भर्ती हैं डॉ. निशंक
  • इलाज के दौरान भी शासकीय काम निपटाते रहे केंद्रीय शिक्षा मंत्री
  • चर्चा में है एम्स के बिस्तर से लिखी कविता ‘कोरोना’

नई दिल्ली। लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री व उत्तराखंड बीजेपी के चाणक्य कहे जानेवाले डाॅ. रमेश पोखरियाल निशंक ने कोरोना पर जीत दर्ज कर ली है। डॉ. निशंक अब पूरी तरह स्वस्थ हैं। उनके चाहने वालों के लिए खुशखबरी है कि वह जल्द ही अस्पताल से घर लौटेंगे।

गौरतलब है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री डाॅ0 रमेश पोखरियाल निशंक, अप्रैल माह में कोविड-19 के शिकार हो गए थे। एक बार एम्स में भर्ती होने के बाद वे पुनः दूसरी बार अस्वस्थ हो गए थे। उन्हें दुबारा फिर से एम्स में भर्ती किया गया था। वे लंबे समय से अस्पताल में भर्ती हैं और अब पूरी तरह बसे स्वस्थ हैं।

उत्तराखंड BJP के कद्दावर व बेहद ही लोकप्रिय नेता डॉ. निशंक विपरीत परिस्थिति में भी हार न मानने व संघर्ष करने वाले जीवट नेता के रूप में जाने जाते हैं। उनके बीमार होने की खबर से उनके चाहने वाले काफी निराश और दुखी थे।

डॉ. निशंक ने कोविड से जूझने का अनुभव कविता के माध्यम से साझा किया है। उनके द्वारा लिखी ’कोरोना’ नामक यह कविता इन दिनों सोशल मीडिया पर खासी सराही जा रही है। यह कविता कोरोना पीड़ितों में आशा और साहस का संचार भी कर रही है।

डॉ. निशंक अस्पताल में ट्रीटमेंट के दौरान भी लगातार विभागीय कार्य भी निपटाते रहे। इस दौरान उन्होंने न तो स्वास्थ्य के साथ समझौता किया और न ही शासकीय कार्यों के साथ। उन्होंने कोरोना से जंग लड़ने के दौरान भी एकांतवास में मन में आए भावों व शब्दों को कविता रूप में कलमबद्ध किया।

उन्होंने अपने हृदय के भाव व्यक्त करते हुए अस्पताल में लिखा कि उन्होंने कभी हार नहीं मानी है। संघर्षों का सामना करना उनके लिए नई बात नहीं है। लेकिन यह निश्चित ही अलग तरह का संघर्ष था जो आपको मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ देता है। डाॅ. निशंक ने कविता के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि बीमारी से लड़ने के लिए मन में सकारात्मक विचारों का होना आवश्यक है। मुश्किल वक्त में भी कभी हौसला और साहस को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि हौसला ही जीत की कुंजी है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक(फाइल फोटो)

गौरतलब है कि डॉ. निशंक एक मशहूर कवि व लेख़क हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें अनेक अलंकार प्राप्त हो चुके हैं। बहरहाल, अस्पताल के मार्मिक वातावरण और कोरोना की आ रही तमाम नकारात्मक खबरों के बीच लिखी यह कविता, निराशा भरे माहौल में लोगों में आशा का संचार करती है।

’’कोरोना’’

हार कहां मानी मैंने?
रार कहां ठानी है मैंने?
मैं तो अपने पथ-संघर्षों का
पालन करता आया हूँ।

क्यों आए तुम कोरोना मुझ तक?
तुमको बैरंग ही जाना है।
पूछ सको तो पूछो मुझको,
मैंने मन में ठाना है।

तुम्हीं न जाने,
आए कैसे मुझमें ऐसे
पर, मैं तुम पर भी छाया हूँ,
मैं तिल-तिल जल
मिटा तिमिर को
आशाओं को बोऊंगा,
नहीं आज तक सोया हूँ
अब कहां मैं सोऊंगा?

देखो, इस घनघोर तिमिर में
मैं जीवन-दीप जलाया हूँ।
तुम्हीं न जाने आए कैसे,
पर देखो, मैं तुम पर भी छाया हूँ।

                             -डॉ. आर. पी. निशंक

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