हरिद्वार। हरिद्वार में अवैध खनन के खिलाफ हाईकोर्ट की सख्ती के बाद जो तस्वीर सामने आनी चाहिए थी, वह कानून के सख्त पालन की होनी चाहिए थी। लेकिन हकीकत इससे उलट नजर आ रही है। जिन स्टोन क्रेशरों को अदालत के आदेश पर सील किया गया, उन्हीं के भीतर से मशीनें रहस्यमयी तरीके से गायब हो गईं। अब सवाल सिर्फ खनन तक सीमित नहीं है—सवाल यह है कि क्या हाईकोर्ट के आदेश की खुली अवहेलना हुई है, और अगर हां, तो इसके पीछे कौन जिम्मेदार है?
गौरतलब है कि हरिद्वार में मातृ सदन की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अवैध खनन के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था। इसके तहत 48 स्टोन क्रेशरों को सील करने के आदेश दिए गए, जिस पर प्रशासन ने कार्रवाई भी की। यह कदम पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ी पहल माना गया।
सील क्रेशरों के अंदर से मशीनें निकाली गईं
लेकिन अब सामने आ रही जानकारी ने इस पूरी कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि कुछ क्रेशर मालिकों ने सील किए गए परिसरों के अंदर से ही भारी मशीनरी और उपकरणों को गुपचुप तरीके से बाहर निकाल लिया। यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है। जब क्रेशर सील थे, तो अंदर प्रवेश कैसे हुआ? क्या सील तोड़ी गई अगर नहीं? तो क्यायह सब प्रशासन की मिलीभगत में हुआ? इसपर अभी आधिकारिक बयान आना बाकी है। 
क्रेशर मालिक का दावा: “हाईकोर्ट के आदेश पर निकाली मशीन”
इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब संबंधित क्रेशर मालिक से इस बारे में सवाल किया गया। तो उन्होंने दावा किया कि मशीनें “हाईकोर्ट के आदेश” के तहत ही हटाई गई हैं। हालांकि, जब उनसे उस कथित आदेश की प्रति मांगी गई, तो उन्होंने पहले वकील के पास आदेश की प्रति होने की बात की। फिर उसे देने से साफ इनकार कर दिया। ऐसे में यह दावा और अधिक संदेह के घेरे में आ जाता है।
क्या यह कोर्ट की अवमानना है?
कानूनी जानकारों की मानें तो यदि बिना किसी लिखित और वैध न्यायालयीन अनुमति के सील किए गए परिसर से मशीनें हटाई गई हैं, तो यह सीधे-सीधे कोर्ट की अवमानना का मामला बन सकता है।
साथ ही, “कोर्ट के आदेश” का हवाला देने वाले पक्ष के लिए उस आदेश का दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है। ऐसा न करना मामले को और गंभीर बना देता है।
जिम्मेदारी किसकी—प्रशासन या खनन विभाग?
इस पूरे प्रकरण में कई एजेंसियों की भूमिका सवालों के घेरे में है। जिला प्रशासन, जिसने सीलिंग की कार्रवाई और
स्थानीय पुलिस, पर सीलिंग की निगरानी की जिम्मेदारी थी। यह जांच का विषय है कि आखिर किसकी मिली भगत से खनन माफिया कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन कर रहे हैं। इसमें खनन विभाग, जो इस कार्रवाई का प्रमुख पक्षकर है। बावजूद इसके अगर क्रेशर अंदर गतिविधियां हुईं, तो यह इन सभी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है।
प्रशासन की चुप्पी और बढ़ते सवाल
अब तक प्रशासन की ओर से इस मामले पर कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है, जिससे संदेह और गहरा गया है। स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि इतनी बड़ी कार्रवाई के बाद भी इस तरह की घटनाएं होती हैं, तो यह कानून के क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
अब सबसे अहम सवाल यही है—यदि यह साबित होता है कि बिना कोर्ट की अनुमति के मशीनें हटाई गईं या इसमें प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत रही, तो यह मामला केवल क्रेशर मालिकों तक सीमित नहीं रहेगा।
कानून के जानकारों का मानना है कि ये काफी गंभीर मामला है। ऐसी स्थिति में खनन विभाग और जिला प्रशासन—दोनों पर कोर्ट की अवहेलना का मामला बन सकता है। जानकारी बताते हैं कि यह गंभीर हमला है। अब नजर इस बात पर है कि क्या इस पूरे मामले में कब तक दोषियों पर सख्त कार्रवाई होती है।
