Uttarakhand Goverment

पटना। आप किसी पार्टी के समर्थक हो सकते हैं या विरोधी हो सकते हैं। लेकिन राजनीति में जो कोई व्यक्ति सचमुच काम करता है, उसकी तारीफ से आप इनकार नहीं कर सकते। निश्चित तौर पर ऐसे नेता, मुख्यमंत्री या मंत्रियों की तारीफ होनी चाहिए जो इस कोविड काल में भी, बिना डरे कोरोना मरीजों के बीच जा रहे हैं। पूरे देश के मुख्यमंत्रियों को अगर आप देखें, तो बहुत ही कम ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जो पीपीई किट पहनकर या अपनी सुरक्षा मानक पालन करते हुए जनता के बीच पहुंच रहे हैं।

दरअसल इस मुश्किल हालात में भी जब कोई मुख्यमंत्री खुद, जनता के बीच पहुंचते हैं, खुद कोरोना मरीजों से मिलते हैं और वह भी आईसीयू में जाकर, तो इसका मैसेज बहुत बड़ा होता है। यह मैसेज उन COVID मरीजों को हिम्मत देता है कि वो अकेले और बेसहारा नहीं हैं। हिम्मत यह कि इस सबसे मुश्किल वक्त में जब आपके परिवारवाले भी आपसे नहीं मिल सकते हैं, तब आपके साथ आपकी सरकार खड़ी है और खुद मुख्यमंत्री खड़े हैं।

दूसरी तरफ जब किसी राज्य का मुख्यमंत्री खुद को अपने घर मे कोरोना के डर से कैद कर लिए हो और इंटरनेट के माध्यम से शासन चला रहे हों, तो उनके प्रति जनता गुस्सा जायज प्रतीत होता है। वह भी तब, जब उन्हें यह पता चले की किसी अन्य राज्य के मुख्यमंत्री कोरोना मरीजों के साथ पूरी तरह से खड़ी है और उनके मुख्यमंत्री घर में बंद हैं।

आज हम यहां एक छोटे राज्य उत्तराखंड और एक बड़े राज्य बिहार की सरकार की तुलनात्मक बात करेंगे। दोनों ही राज्य में बीजेपी का शासन लेकिन कार्यशैली में जमीन और आसमान का अंतर है। उत्तराखंड जैसे नवोदित राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्री लगातार कोरोना में जनता के बीच जा रहे हैं। हॉस्पिटल, कोविंड सेंटर में जाकर निरीक्षण कर रहे हैं। खुद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत पीपीई किट पहनकर उत्तराखंड के दूरस्थ जनपदों के कई अस्पतालों में आईसीयू में कोरोना मरीजों से मिल रहे हैं, उनका हालचाल जान रहे हैं और उनके ठीक होने की कामना भी कर रहे हैं।

तीरथ सिंह रावत जब से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने हैं, लगातार कोरोना मरीजों के बीच जाकर हॉस्पिटलों का इंस्पेक्शन कर रहे हैं। डॉक्टर ऑन द स्पॉट बुलाकर उनसे बातचीत कर रहे हैं और निर्देशित भी कर रहे हैं। यहाँ आपके बताते चलूं कि यह तब हो रहा है, जब खुद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत कुछ दिनों पहले ही कोरोना संक्रमित हो चुके हैं। कहते हैं राजनीति सेवा और जनता से जुड़ने का एक माध्यम है। जब मुश्किल बड़ा हो, संकट भयानक हो, तब यह परखा जाता है कि कौन से नेता अपने जनता के प्रति कितना लगाव रखते हैं।

वहीं दूसरी तरफ तकरीबन 15 साल से बिहार के मुख्यमंत्री पद पर आसीन, कई दलों के अंदर-बाहर हो चुके, कभी भारत प्रधानमंत्री के सबसे योग्य उम्मीदवार कहे जाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बात करें, तो ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें सत्ता सुख के मोक्ष की प्राप्ति हो चुकी है। मानो वह अपनी राजनीतिक पारी की रिटायरमेंट की अप्रत्यक्ष घोषणा कर रहे हों।

कोरोना की दूसरी लहर आते ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद को मुख्यमंत्री आवास के अंदर सीमित कर लिया है। वह अपने आवास से बाहर बिहार के अन्य जनपद तो दूर, पटना में भी नहीं निकलते। शायद उन्हें डर है कि अगर बाहर निकलेंगे तो COVID-19 का वायरस उन्हें दबोच लेगा। ऐसा डर लाजमी भी है! क्योंकि शायद उनकी उम्र इसकी इजाजत न देती हो। कोरोना से जुड़ी तमाम रिपोर्ट्स यह बताते हैं कि 65 साल से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए यह प्राणघातक है। इस लिहाज से बिहार के 70 साल के बुजुर्ग मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का डर वाजिब भी है।

लेकिन इसके साथ ही एक सवाल जो आम लोगों के जेहन में है कि जब आपकी सेहत और उम्र, आपको घर से बाहर निकलने की इजाजत न दे रहे हों तो फिर सत्ता तृष्णा क्या 12 करोड़ से ज्यादा आबादी के जीवन को दांव पर रखकर जायज है? वह भी तब जब आप उस राज्य के तीसरे नंबर की पार्टी के मुखिया हैं।

गठबंधन को अगर दरकिनार कर दिया जाए और जनादेश को पार्टी के आधार पर महसूस किया जाए तो साफ प्रतीत होता है कि बिहार की जनता ने पिछले चुनाव में नीतीश कुमार को रिजेक्ट कर चुकी है। लेकिन सत्ता की मजबूरी ही है कि दो अलग-अलग छोर पर खड़ी पार्टी, एक साथ आकर खड़ी हो जाती है और बिहार के लोग आश्चर्यचकित होकर सिर्फ देखते रह जाते हैं।

आज जनता सबसे बड़ी त्रासदी में है। CM खुद कमरे के अंदर बंद हैं। इन्हें क्या कहा जाए? इन्हें एक सफल मुख्यमंत्री कहा जाए? बहुत बड़ा नेता कहा जाए? जनप्रिय कहा जाए? लोकप्रिय कहा जाए? या कुछ और? बिहार की जनता जब-जब दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री की पीपीई किट पहनकर जनता के बीच जाते तस्वीर देखती है तो उन्हें बहुत ही इर्ष्या और शर्मिंदगी होती है। क्योंकि उनके मुख्यमंत्री महीनों से CM आवास के अंदर बंद हैं। शायद
मुख्यमंत्री को अपनी ही जनता से मिलने में डर लगता है। उन्हें डर लगता है कि जनता से मिलने-मिलाने के क्रम में कहीं उन्हें COVID-19 न हो जाय।

सीएम साहब! जब आपके पास पूरे राज्य का संसाधन है। कोविड प्रोटोकॉल के अनुसार आप कोरोना सुरक्षा के तमाम एहतियाती कदम उठाने में सक्षम हैं। बावजूद इसके आप अपने राज्य में घर से बाहर निकलने में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तो आपकी तरह का ही किसी मां का बेटा, किसी घर का मुखिया, आपके राज्य में कैसे सुरक्षित महसूस करेगा?

सिर्फ शाम को रिपोर्ट लेना, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अधिकारियों को दिशानिर्देश देना भर ही एक CM का काम रह गया है, तो फिर इस काम के लिए पटना में भी रहने की क्या जरूरत है? अमेरिका से भी किया जा सकता है। जब कैप्टन बाहर आकर खुद नेतृत्व नहीं करेंगे तो उनकी टीम के दूसरे खिलाड़ी का मनोबल कैसे बड़ा होगा?

जनता आपकी तरफ देख रही है मुख्यमंत्री साहब! कब निकलेंगे और खुद नेतृत्व करेंगे. क्योकि कोविड मारक है लेकिन भूख और बेरोजगारी उससे भी बड़ा दानव है, जो पिछले 2 साल में इतना बड़ा हो चुका है कि वह इंसानी जीवन को तबाह करने के लिए तैयार बैठा है। इसलिए सोचिएगा जरूर…क्योंकि आप की जनता आपको बुला रही है।

Uttarakhand Goverment

1 COMMENT

  1. […] मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों से अपील की कि प्रत्येक व्यक्ति एक -एक वृक्षारोपण कर पर्यावरण के संरक्षण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दें। पर्यावरण की सुरक्षा आम आदमी के जीवन से जुड़ा विषय है। पर्यावरण का संरक्षण हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। […]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here